देखता रहता हूँ तुझे रोज़ जी भर के मैं इतना,
काश मेरी भी तेरे साथ एक तस्वीर होती,
बंद आँखों में एक सूरत तो मैंने राखी थी,
सामने राखी होती मेज़ पे तो खूबसूरत होती,
सिलसिले परेशान हैं और हालात भी वीरान,
मुझे मिलती नहीं तो और भी ज़रुरत होती,
यूँ चले जाओगे मुझे छोड़कर तुम तनहा,
अगर मिल जाते तो, जीने की ज़रुरत होती,
साथ जी लेते तो, समझ लेते एक दूजे को,
ज़िन्दगी ज़िल्लत से और भी खूबसूरत होती,
साथ मे बैठकर, एक मेज़ पे जो खाई थी,
ख़त्म न होती तो एक निवाले की ज़रुरत होती,
कितनी उम्मीद से वो हाथ थामा था मैंने,
मैं न थामता, तो तुम्हे सहारे की ज़रुरत होती,
आज तुम्हे इस हरपाल की ज़रुरत नहीं,
नौकरी होती नहीं तो पैसे की ज़रुरत होती |