Pages

Wednesday, February 29, 2012

Main Kahan Hosh Mein.....

अब के जिंदा रहूँ ,
याँ कुछ कर जाऊं ,
मैं कहाँ होश मैं हूँ ,
जो कुछ कर जाऊं |

होश आता तो पूछ लेता खुद से ,
अब मैं जीयूं ज़रा याँ मर जाऊं ,
मैं कहाँ होश मैं हूँ ,
जो कुछ कर जाऊं |

दूर से देखती रही तू मुझे वरना ,
तू अगर ठहरती ज़रा , तो चल जाऊं ,
मैं कहाँ होश मैं हूँ ,
जो कुछ कर जाऊं |

खुछ रहे वोह जो संभल गए थे ज़रा ,
मैं कहाँ ख़त्म हूँ , जो जल जाऊं ,
अब के जिंदा रहूँ ,
याँ कुछ कर जाऊं ,
मैं कहाँ होश मैं हूँ ,
जो कुछ कर जाऊं |

मुझको बर्बाद कर रही थी तू ,
वरना क्या बात थी जो दर जाऊं ,
मैं कहाँ होश मैं हूँ ,
जो कुछ कर जाऊं |

मुझको पीने का कहाँ शौक रहा ,
बस एक हक - - अदा सा कर जाऊं ,
मैं कहाँ होश मैं हूँ ,
जो कुछ कर जाऊं |

तुने रोका होता तो ठहर जाते ज़रा,
तुने रोका ही नहीं , तो क्यूँ ठहर जाऊं ,
मैं कहाँ होश मैं हूँ ,
जो कुछ कर जाऊं |

अब मैं जीयूं ज़रा याँ मर जाऊं ,
मैं कहाँ होश मैं हूँ ,
जो कुछ कर जाऊं |

No comments:

Post a Comment