मेरे पास भी उसकी खरीदी हुई कुछ चीज़ें थी ,
सोचता हूँ अब मैं उनका क्या करूँ ,
फेक्दूं उसे यां संभाल्लूँ उसे,
सोचता हूँ एसे ख़याल का अब क्या करूँ
एसे चीज़ों के कोई मोल नहीं होते हैं ,
देते वक़्त जुबां पर कोई बोल नहीं होते हैं ,
खरीदते हैं हम उन्हें पैसों से मगर,
अब अगर कोई बेचता है तो क्या करूँ
संभाल कर रखता हूँ उन चीज़ों को मैं ,
जी नहीं चाहता है पर क्या करूँ,
जब तुम्हे मेरी ही ज़रुरत नहीं ,
सोचता हूँ अब इन नतीजों का क्या करूँ
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